रविवार, 23 दिसंबर 2012

रंगभेद

उस कमरे का दरवाजा अंदर से बंद है ! मंगल बाहर उत्सुक सा टहल रहा है ! कमरे से कुछ औरतों के बोलने की, और बीच-बीच में एक औरत के चींखने की आवाज आ रही है ! ये सब झूमरी के प्रसव का आयोजन है !...................कुछ समय बाद ! “केहाँ...केहाँ...केहाँ !” बच्चे के रोने की आवाज हुई ! अब मंगल बेचैन हो उठा ! कि तभी कमरे का दरवाजा खुला, और रामधुनी काकी बाहर निकलीं !
“के हुवा काकी?” मंगल ने उत्सुकतापूर्वक पूछा !
“वही, जौन का डर था !” काकी मुह बिचकाते हुवे बोलीं !
“मतलब.......लईकी.....कौनो बात नही काकी, अब जे हुवा सो अपना ! वईसे, ऊ सरकारी अफसर कह रहे थे कि लईकी के लिए बड़ी सरकारी-सहूलियत है ! जे हुई है, तो बेड़ा पार लगाना तो पड़ेगा ही !” 
“अरे मंगल! एतने मुसीबत थोड़े है, लईकी त लईकी, ओपर रंग काला ! रूपे-रंग त लईकी के पास होत है, ई ओमे भी खोटी...!”
“काली.....” कहते हुवे मंगल सर पकड़कर धम्म से बैठ गया !

-पियुष द्विवेदी ‘भारत’   

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