मोहन अपने रोते भतीजे को घर के बाहर गोद में लिए चुप करा रहा था ! तभी, राज आ गया !
“छोटू को क्या हुवा
मोहन?” राज ने पूछा !
“भाभी बाजार गईं है,
इसलिए रो रहा है !”
“अरे! क्यों रोएगा,
हमारा भतीजा है !” राज बोला और फिर बच्चे की ओर देखकर, “ऊ ऊ...चुप हो जा...राजा
बाबू...!”
“मोहन... मेरी दवाई?”
ये आवाज घर के भीतर से आई थी !
“ओह! चाचा की दवा लानी
थी, मै छोटू के चक्कर में भूल गया ! राज, जरा इसे दो मिनट गोद लेना, मै अभी आया !”
मोहन राज से बोला !
“ओह नो! सॉरी, यार
मोहन, मुझे भी बाबा की दवाई लानी थी ! बहुत देर हो गई, चलता हूँ !” राज मन में
बुदबुदाता चल दिया, “अपना बच्चा दूसरे सम्हालेंगे, मूत-ऊत देता, जान बची !”
-पियुष द्विवेदी
‘भारत’
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